Tuesday, December 14, 2010

सानिध्य सुनने में तो सिर्फ एक शब्द, लेकिन उत्साह पूर्ण |
आप ने बहुत अच्छा लिखा है, सानिध्य ही मनुष्य को बना देता है,
और बिगड़ भी देता, बस फर्क है तो सिर्फ सानिध्य का |
अच्छी रचना , सार्थक रचना
बहुत - बहुत शुभकामना 

Friday, November 5, 2010

इक सानिध

इक सानिध ही तो है,
तेरा मेरा मिलन अनूठा, इक सानिध ही तो है॥
जल में अग्नि और अग्नि में जल जैसे,
घट में नभ और नभ में घट है जैसे, इक सानिध ही तो है॥

वायु में प्राण और प्राण में वायु हो जैसे,
सुगंध में गंध और गंध में सुगंध जैसे,
वैसे ही मिलन ये मेरा तेरा, इक सानिध ही तो है॥

मर्म ये भीतर उस चिदानंद के,
तत्व रूप उस परम तत्त्व में जैसे,
नहीं मिटता ये नित्य रास, इक सानिध ही तो है॥

विचित्र योनि ये मानव चेतन,
लय में प्रलय को ढूंढता जैसे,
स्वयं ही स्वयं का स्वयंभू जैसे, इक सानिध ही तो है॥

सानिध ही लीला सारी,
होगा तेरा लय निश्चित,
छोड़ भ्रम के भंवर को अभी, इक सानिध ही सत्य है॥
इक सानिध ही सत्य है..


शुभ दिवाली

आप सभी मित्र गणों को समस्त युगहंस परिवार की ओर से दिवाली के शुभ अवसर पर हार्दिक बधाइयां॥ प्रस्तुत हैं:
जब धरनी हुई कुंठित, मानव हुए संकुचित॥
फिर अस्मिता बनी द्रोपदी, क्या हम हैं निर्दोषी॥

आओ प्रण ले इस पावन पर्व पर, आवाज उठाने का, क्योंकि ठीक ऐसे ही कहता था..वो बूढा-लाठी वाला कि अत्याचार को सहना भी करने के बराबर ही है..उससे कम नहीं है..

Wednesday, October 13, 2010

उदघोष का अर्थ

वाकई, उदघोष का जो शाब्दिक अर्थ होना चाहिए, आप ने सत्यार्थ किया है, उदघोष का मतलब ही जागृत करना होता है, भगवतगीता में, श्री कृष्ण ने गीतोपदेश को उदघोष ही सम्बोधित किया है, और श्री मदभगवत गीता का वास्तविक नाम ही उदघोष है|
   क्योंकि महाभारत के समय में श्री कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दे कर  इस नाम को सार्थक कर दिया था, कि ये गीता तो है ही, लेकिन ये उदघोष भी है, क्योंकि गीता का परीभाषिक अर्थ होता है ("संसार  सार का, तत्त्व रूप ")  ये संसार का सार रूप तो है ही, और मानव को जागृत करने का उद्गम भी गीता है,
 और आज के समय में गीता को प्रबंधन का मुख श्रोत कहा जा सकता, क्योंकि गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने मानव प्रबंधन और आत्मविस्वाश का सारा गुण डाल दिया है  |

Tuesday, October 12, 2010

धन्यवाद

Monday, October 11, 2010

॥ उदघोष ॥
"पुनः सर्व सार्थक सत्य यह ...कर्म ही परम भव्य है ॥ उस परम ज्योत का अंश यह ...अमित अक्षत अदम्य है ॥ मत हार हिम्मत, ऐ मानुष! कृष्ण रूप वो सबके  भीतर ...नित देता गीता ज्ञान हमें ...धर्म: एव स्थाप्यते: ...सत्य: एव विजयते: ..."

Wednesday, August 25, 2010

जय लोक मंगल: भगवान सिंह हंस होने का अर्थ


चिंतन


भगवान सिंह हंस होने का अर्थ

बहुत दिनों से सोच रहा था कि मैं भगवान सिंह हंस होने का अर्थ क्या है इस पर कभी कुछ लिखूं। लेकिन मन के रथ पर बैठा मेरे अस्तित्व का अर्जुन तमाम शंकाओं और जिज्ञासाओं के भार से दबा अनमना-सा अक्सर इस काम को आज के हाथ से लेकर कल के हाथों में सौंप देता था। और बात आई-गई हो जाती थी। मगर आज मन के रथ के सारथी स्वयं कृष्ण बन गए। और उन्होंने मेरे अभिव्यक्ति के रथ को धर्मक्षेत्र में उतार ही दिया। हमेशा होता भी यही है कि हर मनुष्यरूपी अर्जुन की देह में सांसों का रथ होता है। हर व्यक्ति स्वयं एक अर्जुन है। रथ उसका है। इसलिए उसका स्वामी भी उसे ही होना चाहिए मगर ऐसा हो नहीं पाता। रथ का स्वामी रथ में लगे इच्छाओं के घोड़ों का अनजाने ही दास हो जाता है। ऱथ हमारा होता है मगर चलता है वह घोड़ों की इच्छा से। रथ का स्वामी घोड़ों का दास हो जाता है। संशयग्रस्त अर्जुन को तभी अपने स्वामी होने का ज्ञान होता है जब रथ में लगे इच्छाओं के घोड़ों की लगाम को काबू में करने के लिए चेतना के कृष्ण स्वयं सारथी बन जाते हैं। तब अर्जुन गांडीव उठाते हैं। आज मेरी सांसों के रथ पर चेतना के कृष्ण विराजित हैं। संभव है मुझ पर आज गीता का ज्ञान उतरे। दिव्यता की भगवत्ता मैं आज मैं जागूं और भगवान की विराटता के किसी एक अंश का अर्थ कुछ-कुछ समझ सकूं। हर धर्म में प्रकाश को ही ईश्वर माना है और हर धर्म मनुष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलने का आमंत्रण देता है। हर धर्म दिव्य प्रकाश से प्रकाशित होने का ही अनुष्ठान है। बाइबिल में प्रार्थना है- लैट देअर बी लाइट एंड देअर वास लाइट..। वेदो में ऋषियों की गुहार है- सनः ज्योति..। त्रिपटक में बुद्ध मनुष्य को आलोकित दीपक होने का आशीर्वाद अप्प दीपो भव की मुद्रा में देते हैं। तमसो मा ज्योतिर्गमय हमारी संस्कृति का मूल मंत्र है। सूर्य की उपासना प्रकाश का ही वंदन-अभिनंदन है। सूर्य सारे संसार की आत्मा है क्योंकि सूर्य प्रकाश पुंज है और पृथ्वी सूरज का ही एक टुकड़ा। सूरज सारी दुनिया को प्रकाश देता है मगर इस सूरज को प्रकाश कौन देता है। सूरज जिस प्रकाश से आलोकित होता है वह ही भर्ग कहलाता है। यह भर्ग ही भग है। और इस भर्ग को, इस भग को घारण करनेवाला ही भगवान है। भगवान यानी प्रकाशवान। तो यह तो हुई भगवान की एक व्याख्या। .. अब सिंह की बात भी कर लें। सूर्य समस्त संसार का भगवान है। और यह सूर्य ही समग्र संसार की आत्मा है। ज्योतिष में यह सूर्य ही सिंह राशि का स्वामी है। यानी की सूर्य भगवान जहां निवास करते हैं वह सिंह राशि है। चूंकि सूर्य स्वयं ब्रह्मांड के राजा हैं और सिंह राशि में निवास करते हैं इसलिए सिंह को भी जंगल का राजा माना जाता है। तो जो भगवान है और राजा भी वह सिंह है। यानी कि भगवान सिंह। हरिण्यकश्यपु के वध के लिए भगवान सिंह का ही अवतार लेते हैं। नरसिंहावतार..।

अब बात की जाए हंस की। तो हमारे यहां तीन लोक गोचर में दृष्टिगत होते हैं-जल,थल और नभ। संसार में केवल हंस ही एक मात्र पक्षी है जो जमीन पर चल सकता है,पानी में तैर सकता है और आकाश में उड़ सकता है। यानी कि तीनों लोक में गमन की सामर्थ्य रखता है-हंस। विष्णु जो तीनो लोक के पालनहार हैं उन्हें हंस ही अपनी पीठ पर बैठाकर त्रिलोक की यात्रा कराता है। सरस्वती जो ज्ञान की देवी हैं उनका वाहन भी हंस ही है। हंसवाहिनी..वीणावादनी। नीर और क्षीर को अलग कर देने का विवेक हंस के ही पास है। इसलिए ज्ञान की देवी ने इसे अपना वाहन बनाया। खान-पान में इतना संयमी कि या तो हंसा मोती चुगे या लंघन कर मर जाए। बीच का कोई समझौता नहीं। तो जो स्वयं सरस्वती को तीनों लोक ले जाए उसके ज्ञान की क्या सीमा। वह तो अनंत है। जो नीर-क्षीर विवेकी है। जो आहार और विचार में संयमी है वही हंस है। इसीलिए तो हमारे यहां अत्यंत सिद्ध व्यक्ति को परमहंस कहा जाता है। विवेकानंद के गुरु-रामकृष्ण परम हंस कहे जाते थे। सांसारिक व्यवहार में सज्जन व्यक्ति को राज हंस कह कर ही संबोधित किया जाता है, आमंत्रित किया जाता है-

हे मानस के राजहंस तुम भूल न जाना आने को।

 

प्राणी के शरीर में जो आत्मा का परिंदा बैठा है वह हंस ही है। हंस ही प्राण है। इस प्राण के कारण ही जीव प्राणी कहलाता है। प्राणों का ये हंस अपनी इच्छा से शरीर के पिंजरे में विश्राम करता है। तोड़ शरीर की नश्वर काया ये हंसा इक दिन उड़ जाएगा। वह कितने दिन रुकेगा इसका फैसला वह खुद करता है। यह आत्मा ही हंस है। यह आत्मा ही सूर्य है। यह सूर्य ही है जो सिंह राशि में निवास करता है। और सूर्य स्वयं भगवान है। तो इस तरह भगवान,सिंह और हंस तीनों एक ही दिव्य शक्ति के तीन भिन्न रूप हैं। तीन होकर भी यह एक ही हैं। ईश्वर की यही तो लीला है। वह एक भी है और अनेक भी। एकोरूप बहुस्याम..। मैं खुशनसीब हूं कि मुझे भगवान का सान्निध्य मिला। सिंह और हंस के संबोधन में। वैसे मेरी राशि भी सिंह हैं। भगवान सूर्य की विश्राम स्थली। शायद यह मणि-कांचन संयोग इसलिए ही मुझमें उतरा हो। मैं प्रभु का आभारी हूं..कि वो किस-किस तरह से मेरे साथ है।


बाकी बातें फिर कभी...

मेरे प्रणाम...

पंडित सुरेश नीरव



Monday, June 21, 2010

ये मेरा गीत..

..ये मेरा गीत
जीवन संगीत
कल फिर कोई दोहराएगा..
..जग को हँसाने
भेष बदल.....
कल भी कोई फिर आयेगा..
..अपने यही दोनों जहाँ
इसके सिवा जाना कहाँ
..जब चाहे हमको आवाज दो ..
..हम थे जहाँ
हम है वहां
..जीना यहाँ मरना यहाँ
इसके सिवा जाना कहाँ?