Friday, November 5, 2010

इक सानिध

इक सानिध ही तो है,
तेरा मेरा मिलन अनूठा, इक सानिध ही तो है॥
जल में अग्नि और अग्नि में जल जैसे,
घट में नभ और नभ में घट है जैसे, इक सानिध ही तो है॥

वायु में प्राण और प्राण में वायु हो जैसे,
सुगंध में गंध और गंध में सुगंध जैसे,
वैसे ही मिलन ये मेरा तेरा, इक सानिध ही तो है॥

मर्म ये भीतर उस चिदानंद के,
तत्व रूप उस परम तत्त्व में जैसे,
नहीं मिटता ये नित्य रास, इक सानिध ही तो है॥

विचित्र योनि ये मानव चेतन,
लय में प्रलय को ढूंढता जैसे,
स्वयं ही स्वयं का स्वयंभू जैसे, इक सानिध ही तो है॥

सानिध ही लीला सारी,
होगा तेरा लय निश्चित,
छोड़ भ्रम के भंवर को अभी, इक सानिध ही सत्य है॥
इक सानिध ही सत्य है..


1 comment:

Sunil Kumar said...

अतिसुन्दर भावाव्यक्ति , बधाई के पात्र है