Thursday, February 10, 2011

युगवाणी-२: बढती जनसंख्या (व्यंग्य)

कुम्हार कहे उस माटी से, नहीं रौंद सकी तू मोय।
हर निर्जन अब जन भया, कब दिल्ली पेरिस होय॥

Saturday, February 5, 2011

युगवाणी - १


वादों में अपवाद शेष हैं, मादों में उन्माद शेष हैं,

दु:शासन के इस गणतंत्र में, संसद के अवसाद शेष हैं।


भारत की इस कर्मभूमि पे , धर्म नहीं! बस अधर्म शेष हैं,

है युगवाणी इक युगहंस की, हर अर्जुन में एक कृष्ण शेष हैं।